कविता

अस्यांईं न्हैं मंड जावै

कविता मांडवा कौ

होव अेक खास मौसम

जीं में

आकास सूं होवै

बरसात अंगारां की

झमाझम

खड़ आव

बाल्मीकि-पीड़ा कौ तावड़ौ

पलक झमकताईं

भरी धपेरी मं

लगज्या घूमबा

झूठ्यांईं का दम्भ की

ताण’र छतरी

चांदणी

अर

चोटी मं बांध’र

धूप को स्कार्फ

रात

कातबा लाग जावै चरखौ

रूंखड़ा

खोल ल्यै मंहद्‌यां

आपणां पांवां की

अर

करबा लाग ज्या परेड

मरुथळां की छाती पै

पपइया

लेबा लाग ज्या उबास्यां

दन-दनूंग्याई

कागला

सूती कोयल नै

लेती देख’र अंगड़ायां

गावा लाग ज्या मल्हार

फूलां का पानडां मं

उग आव सेळ

अर

चट्टाणां

तानसेनां का माथै चढ’र

छेड देवै दीपक राग

तस की मारी

नद्‌यां

मांगबा लागै पाणी

समन्दर गर पड़ै खा’र पछाड़

औंधा मुंह

अर

परबतां काै गरब मं

हिलोरां लेवा लाग जावै

ज्वार-भाटा

अस्या रुपाळा मौसम मं जद

चालवा लागै

आंध्यां परेम की

चारूं मेर

तब

उतरै कविता

धरती की कोख सूं

अर मंड जावै

आखर-आखर

आसमान का सीना पै

आपी-आप

कविता

अस्यांईं न्हैं मंड जावै

कविता मांडवा को

होवै अेक खास मौसम।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कृष्णा कुमारी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
जुड़्योड़ा विसै