कवि-मजलस में कवयित्री बोली सुकुमारी।
कवि शायर विद्वान सुणो जी अरजी म्हारी।
भौत दिनां सैं सोच रही बोलूं, क्यूं बोलूं।
चातर करौ विच्यार जणां तो मूंडो खोलूं।
चमड़ी चरबी, हाड मांस लोही छै वै ही।
जिसी मरद की उसी लुगाई की छै देही।
तो भी दीखै होळी की झळ नर नै नारी।
कदै रूप को डळो कदै मधु रस की झारी
अंगड़ाई ले नार हाथ कर आंका-बांका।
शायर का दिल का जख्मां का टूटै टांका।
आंख्यां चोखी रैवै चिनोसो काजळ घाळै।
वो ई काजळ क्यूं यांकी छाती मै सालै?
चूड़ी-बंगड़ी बजी, जरा पायल खणकाई
लगै मरद नै अहा, मदन दुंदुभी बजाई।
बांका पग ज्यौं पड़ै, हालती चालै कामिण।
उपमा देवै झट्ट, आ रही छै गज गामिण।
जिसी सबां की नाक, श्लेषमा-सेड़ा आवैद्ध
कवि पण उपमा छांट, सुवा की चूंच बतावै।
जूंवां पड़ी हो, लीखां लाख, लटूर्या कांधै।
कवि नै लागै, म्हां को मन जूड़ा नै बांधै।
जो कोई सैं जरा भौत हंस बोलै नारी।
पति परमेसुर का हिरदा में बहवै कटारी।
परकिया प्रौढ़ा, ऊढ़ा अर चपल नवोढ़ा।
न्यारा-न्यारा नांव धर दिया लांबा चौड़ा।
बधै काळजै माँस, लुगाई क्यां में बाड़ै?
टपकै यांकै लाळ, टापता दीदा फाड़ै।
रच्या रामजी अक टाबर नै दूध पिवावै।
पण कवियां नै काम केलि-कुदंक दरसावै।
हारी थाकी नगर बिच्यारी लेय उबासी।
रति आळस का भाव हेरबा कवि लाग जासी।
त्रिवळी बिच सूंडी भी कवियां नै भरमावै।
उपमा दे सिव सीस लाग्यौ तिरपुंड बतावै।
हंसै, लुगाई बैठै, चालै, सोवै-जागै।
ऊं की हरकत सभी अदा ज्यूं थांनै लागै।
बात-बात में शायर फेंकै छै अपणा दिल।
तिल छै चर्म-विकार लगै पण यां नै कातिल।
बा थोड़ी सी ढबी, जरा सी थ्यावस खाई
इतना में तो सभी जणां टकटकी लगाई।
या बोलै जद ईं कै माळै आब चढै छै।
सब नै लागै अक मूंडा सै फूल झड़ै छै।
कवियां की मजलस में ज्यौ मदलेसी छागी।
पाणी पीयौ और बोलबा फेरूं लागी।
रच्या नायका भेद बापड़ा ठाला भूला।
पण म्हांकै तो पांती आया चाकी चूल्हा।
कर्या कटाक्ष'र हाव-भाव का लीक लकोळा।
पोथां में सिणगार रचाया पूरा सोळा।
नीबूं, तूंत, अनार, फालसा, आम बतावै।
बस चालै मरदां को तो म्हां नै खा जावै।
जीबौ कर्यौ हराम, लुगायां को ये शायर।
खुद भी केई बार जीवता होवै मर-मर।
वृथा काम की शिक्षा क्यूं थे देणौ चावौ।
सिरफ भरथरी को सिणगार सतक बंचावाओ।
कदै रूवावै, कदै हंसावै, कदै खिजावै।
पग की जूती कदै, काळजै कोर बतावै।
जुलम जोर अन्याव, हुकम सह छांनी-मांनी
अेक बूंद पाणी बेई अरपै जिनगानी।
सुणली सगळी बात काव्य रिसि हंसबा लाग्या।
जीभां लपलप करै घणां चिंतण मन जाग्या।
शायर कही कै तूं बिरमा की अनुपम रचना।
थारै बिना सिस्टी की किंचत नहीं कल्पना
तूं ही माता, तूं ही धरणी, तूं ही भगिनी।
धरम, अरथ अर काम, मोच्छ की तूं ही संगिनी।
कही बिहारी लाल त्रिलोकी में तूं प्यारी।
बिरमा हो कै विष्णु होय शिव भव भय हारी।