रूंख रूंखाळो आसरो

और नदी रो हेत

जामण जाया

भली करी

रूंख बंच्या नीं खेत

गौर हिलावै गाबड़ी

बेढंग चालै चाल

ऊपर वाळो मुळकावै

देख जगत रा हाल

करमां नै कांईं रोवणो

खोटा काम अर काज

धमक चाल कांई कैवणो

बिगड़्या काल’र आज

इक डूबै इक नीवड़ै

इण जीवण रा रंग

बोरी गरब समाव री

काठी है अर तंग

दाझी सुख री गोदड़ी

कळप्यो सकल समाज

धूपछांव रा खेल में

झड़गी ताब-गुलाब

धाप-धाप नैं झोंकिया

आंख्यां मिरची लूण

देख गाडोळ्यां चालगी

थारी मिनखाजूण

नीं रोया नीं रूठिया

गिरगिट सांप छछूंदर

बाकी सै नै रूंदता

दोड़्या आख्यां मूंद

इण बस्ती री आंच सूं

भाग छूट्यग्या काग

धरती धूळो चाटगी

धूज्या राग-विराग

कुण कैवै कितरा सुणै

आछी सांची बात

अजगर रै दरबार में

कीड़ी री सम्मात।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कुन्दन माली ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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