हियै मिन्दर में

चसती जोत

तूफान आंधी-मेह में

बुझै नीं।

नमण करम धरम रै पांण

अखण्ड जोत बणै हियै री।

घणां कोसिस करै

बुझाणै री

पण किण बिद बुझै जोत?

जै अनीत सूं

बणै तूर्‌रम खां

जोत बुझतां देर नीं लागै

हियौ जळतौ रैवै

सुख री नींद उड जावै।

इण धरती रो

ओई’ज धारौ।

हियै मिन्दर री जोत

जगै-बुझै देस रै वास्तै

देस-धरम रो मान बचै

आंख्यां खुलजा सैंग देसांरी।

हियै मिन्दर जोत चसै

इण माटी री खुशबू

कण-कण में आवै।

सिर फिर्‌योड़ै पाड़ोसी री

नींद उड़ै

हियै मिन्दर री जोत

चसती रैवै।

जोत सूं जोत चसै

इण धरती रो

कण-कण चमकै

हियै जोत चस्यांईं

चिमत्कार हुवै

देस-धरम रो मान बचै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रतन ‘राहगीर’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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