जिंदगाणी री

आपाधापी

कद औसर दे

सोचण रो

समझण रो

कै हाथां सूं

कांई ऊंधो हुयो

अर कांई सूंधो

कीं कमायो

अर कीं गमायो,

बस

खोटा खरा करता रैया

खाता मीठा फळ

चाखता रैया, सैता रैया

अपणी पांती रा दुःख,

निभावता रैया

खुद नै झेलता रैया

यूं ईज

काटता रैया जूण

यूं ईज जीवता रैया

यूं ईज अेक दिन

मर जावांला

यूं ईज।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : कविता किरण ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-31
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