चारूं कानी

जळ ही जळ है।

जळ है

एक जळ

माछळ रो जळ।

जळ है

एक जळ

म्हारो जळ है।

म्हे निज-निजरै

जळ मैं जीवां

जळ मैं खावां

जळ मैं पीवां

जळ मैं जागां

जळ मैं सोवां

जळ मैं हांसां

जळ मैं रोवां।

बां रो जळ है

म्हारो जळ है.

बां रो म्हारो न्यारो जळ है।

एक-दूजै रै जळ मैं जावां

जे म्हे

तो झटपट मर जावां।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत काव्यांक, अंक - 4 जुलाई 1998 ,
  • सिरजक : मोहन आलोक ,
  • संपादक : भगवतीलाल व्यास ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी
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