इण अणखीला अणंत री, कतरी खोज करां,
मावै नंह निज मौज में, मूठी केम भरां?
गहतां दीठ पाधरी ग्रीवा, खितिज सीस द्रग खोलां
धर-अम्बर आधार धारतां, झिलम लखै पड़ झौलां
सागर गोद द्रबकतो दिणियर, लाल कपोल लजन्तो
काजळ रजणि आंख री कोरां, छक संसार छजन्तो
दूणूं नसो दिनान्त, दुबारो, भेळी घूंट भरां।
बिखरी मिणां मोकळी माथै, गंग-ब्योम री गोदी।
आसै छक्यो अरस आलीजो, आज घणों आमोदी
रगड़ कपोल लाल कर राळ्या, लाजी आंख उखारी
झोळी भर रोळी झड़कारी, पुहुमि सीस पर भारी
भागी रैण गैण मग भमती, डरती छोभ डरां।
रहस भर्यो कुदरत रो राजा, ताजा आभ तरीनो
पसर्यो दिसां दसूं पर माथी, किसड़ो अंग करीनो
मापै कुण परकास-बरस में, तापै कुण तन-तोरा
अणगिण सौर-मंडलां साध्या, हिव समझण रा होरा
फोरा सह बिग्यान फिटगा, निरखो सोच नरां।
ओ बिसाल! थारी अधकाई, रसणा केम रटां।
इण ब्रहमंड तणां इधकारी, छिळती आम छटां
तूं प्रतिबिम्ब ईस रा तन रो, मन रो मोटो मोभी
तोखण सिस्टी सागरां पोखण, सोखण दुख नभ सोभी
बिखम बुद्धि तुछता तन री, कहता लाज मरां।