ऊगतै सूरज नै

स्सै निवण करै

तपतै रै लुळै राल्यां न्हांख न्हांख

कोई खामी नीं लखावै—इण मांय

रीत जग री है।

पण म्हैं—रीत सूं परबार

बिसाइजतै सूरज नै

अरघ चढ़ावण में

सुख मैसूस करूं।

ठीक इणी तरां-सूखा ताळ-तळायां

भंभाड़ मारती बावड़ियां

पत्ती बायरा-नागा धड़ंग पेड़

जका बणग्या ठूंठ

मनै घणा सुवावै।

करांवतां रै जका

जथारथ रो साव दरसण

जीवण रै करड़ै अर खरै पख रो

देवै पक्को सबूत।

बां सूं बंतळ करण में

मनै म्हारै हुवण रो

गैरो अैहसास हुवै।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : वासु आचार्य ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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