लाख जतन कर हारी सांसां सगळो जोर लगा,

काया-घट में सुख रो जळ कुण भरण सदा पायो?

बैठ कल्पना रा रामतिया घड़तो रै नितकी,

मनस्यावां रा उण में हंस-हंस अणगिण रंग भरै,

मेळै रै पळकां में निज री सुध-बुध भूल्योड़ो,

प्रळय काळ तक भौमी पर रैवण री आस करै,

आभै री पांख्यां छेवट थक भौम-सरण आवै,

आखी जूणी मनचिंत्या कुण करण अठै पायो?

दरपण में निरखै चैरै नै निरख-निरख फूलै,

रूप-रंग नै थिर राखण रा जतन कर्‌यां जावै,

मन-हरखावण चीजां भेळी करतो रै भोळो,

अन्छ्यावां रो सोनळ आंचळ रोज भर्‌यां जावै,

अणजोरी में सूळां रै गेलै निज चरण धेरै,

सदा फूल री सेजां पग कुण धरण अठै पायो?

धूप-छांव रै तळै पळै सा जीवा-जूण अठै,

कुण है जिणनै सुख-सांयत नित मुजरो करता रै?

रूप बटाऊ रै सगळा आवै धरती उपरां,

कुण है जका सदा इण आंगण पगल्या धरता रै?

फेरा लेणा पड़ै निरासा सागै बेमन सूं

सदा सुफळता री बनड़ी कुण वरण अठै पायो?

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सीताराम महर्षि ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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