हेत हरि रो नाम है

हेत ही चारों धाम।

हेत गयौ तो, के रह्यो,

रैग्यो खाली काम॥

खारो-खारो सुवाद है,

बिना जीव रो ग्यान॥

बीच भंवर में नाव ज्यूं

जीवण होग्यो आज।

रोटी अटकै गळा में,

पचै कोई नाज॥

दया, धरम, सनमान री

कोनी रैगी कांण।

आपसी व्यौहार में,

खींच रिया सब बाण॥

दुनियां बदळगी ‘पूजा’

बदळ रिया सुर-ताळ।

तूं मत बदळज्यै पूजा,

हेत राखज्यै पाळ॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : पूजाश्री ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-33
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