आओ

आकास नै

गिरण सूं बचाल्यां

आपरा दोन्यूं हाथ उठा’र।

थोड़ो आपरो

माथो उठा’र देखो—

आकास आपरै

माथां ऊपरां लटक आयो है।

इण टैम

थे बोना हो—

आकास छू नीं पा रैया हो।

थोड़ाक दिनां तांई

थे और

लाम्बा होवण री कसरत करो

आपरै हाथां नै

ऊंचा उठा’र

थे हंसो नी-ओ हंसी

आकास री नीं होसी-बल्कि

आपरै बौनापण नै

प्रकट करसी।

देखो आजकल

पून भी आपरै सागै है

अर च्यारूं दिसावां में

बैण वाळी भी।

आपरी नावां नै

बेगी-बेगी

नदी री पाळां खन्यां आवण द्‌यो

के पतो-

आगला किणी भी छिण में

आंधी अर तूफान उठ आवै।

अबै देखो!

आकास खुलग्यो है

अर गिरण सूं बचग्यो है

फेर भी

थे चोकस रैवो

आकास कदै भी गिर जावै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : चन्द्रकांता शर्मा ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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