मनै

हथेळ्यां रो गरमास चाहिजै

हथेळी रा आखर नीं

मनै

मिनख चाहिजै

बां रो नांव नीं।

आखर मिट सकै

नांव बदळ सकै

पण

जिण री हथेळ्यां री गरमास म्हारी है

बो मिनख नीं बदळ सकै।

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : अजन्ता चौधरी ,
  • संपादक : माणक तिवारी ‘बंधु’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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