उण सारू, फगत उण सारू

जिकौ घास में अटक्योड़ी जळ-बूंद री भांत अळसाय’र

सूवण इज वाळौ है, म्हनै चोट मत पुगावौ

म्हनै काम करण सारू मत कैवौ।

हरेक चीज सारू म्हनै माफ कर दौ,

भलांई वा मेज सजाणै रै तरीकै माथै म्हारी

झूंझळाट हुवै या हाकै रै प्रति म्हारी नफरत

म्हनै पैली उणनै ओढाय’र सुवावण दौ

पछै थे म्हनै बताईजौ घर री मुस्किलां,

चिंतावां अर काम,

म्हारै माथा माथै, छाती माथै जठैई थे म्हनै

भींटौ हो, वौ है

अर वौ टस्कण लागैला

जे थे म्हनै चोट पुगावोला।

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : गैब्रेला मिस्ट्राल ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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