उडै है हवा रै सागै अर दूरियां रै पार
छोड़ चिन्ता धरण री ओछी अर असार
देवताऊ हंसला अै अलोक थांरा गीत
उड़ंत ऊंचा आभै में अणदीख्या अलोप
उडै है नित आभै में नित परिकथा रै ज्यूं
कै अंधारै में बळै नित दिव्य जोत ज्यूं
वौ पंखेरू वानै सुहावै उड़णौ आभै
पंखधारी नै कठण है जीवणौ जमीं माथै
पण अव्वल है जमीं माथै औ म्हारो हंस
उडणौ वां रौ हक है राजहंस ज्यूं
राजी-राजी गीत गावै कठण सौभाग रा
हरेक काम में वौ कवि री प्रेरणा री सांस
ठंडी अर गरमास में वांरै सपन री आस
म्हारी कविता री हरेक ओळियां
धड़कतै जीवण रौ सौभाग धरती माथै।