हे राम! थारी धरती माथै मोटा जीव कितना,
मालदार मौज करै, च्हावै फेरूं भी धन घणां॥
पण ई धरा म्हां ही कुलबुलावै नैन्हा-नैन्हा जीव,
बापड़ा रैवै माटी म्हां, च्हावै पाणी अर मुठ्ठी चणा॥
आपणै ढाणी तक जावै नीं सूधो मारग, टूंटी-बिजळी,
पढ़बा पोथी, दवा, घासलेट, आटा पीसणी चकली॥
अेक कच्ची पक्की टूटी टापरी, लाज ढकबा दो गाबा
फरियाद क्यांण करै, तू बिराजै काशी-मथुरा, रोम-काबा।
कठै अकाल, कठै बाढ़, आंधी तूफान रै बाद छायो डर
जीव आधा आपदा सूं मर गया, आधा डर सूं गया मर।
हे जगन्नाथ! तू कहलावै दीनदयाल, दीनां रो दीनानाथ,
मजो तन्नै के आवै, नान्हा नान्हा टाबर बण ज्यावै अनाथ।
हे जगतपाल! कदै तो हियां म्हां विचार कर दीनदयाल,
गरीब नै रोटी पाणी पैली, फेरूं मालदार नै देदे माल॥