अेक दिन बाई

सांगरियां अर कांदां रो साग बणायो

अर लूण चाख्यो तो

साव फीको लाग्यो!

थोड़ो फेर न्हाख्यो

अर चाख्यो

तो भी लूण फीको लाग्यो

बाई झट लूण सूं पूछ्यो–

थारै मांयलो खार

गयो कठै परो रे?

लूण बोल्यो

मिनखां में!

स्रोत
  • पोथी : हिवड़ै रो उजास ,
  • सिरजक : मीठालाल खत्री ,
  • संपादक : श्रीलाल नथमल जोशी ,
  • प्रकाशक : शिक्षा विभाग राजस्थान के लिए उषा पब्लिशिंग हाउस, जोधपुर
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