हूं…
हूं कुण! हूं मैं अहं!
अरै गुमानीड़ा,
झाड़बोझा में क्यूं फाटै
तेरै भीतर झांक
अनेकूं हलचल
न्यारा-न्यारा मूंडा सूं होरी है
नाटक रै पात्र-सा
मंच माथै आवै-जावै है
अेक-पड़्यो रिंदरोई में
झाड़कै नीचै
लूवां में पळसेड़ो भूंगो सो
आपरी सांसा रो गिणतकार
दूजो–
फाटी बिवाइयां में
नैणां रो गळतो मोम
झर रैयो है टप-टप
तीजी–
खेजड़ी रै रस्सी बांध
नटणी निरत करै है।
नट ढोल बजावै ढबक ढब
चौथो–
अेक अेक आवड़ी
तपती तावड़ी
भागै तुड़ा कर, ऊंई मावड़ी
अरै गुमानीड़ा,
म्हानै अमूझणी आवै थारै आं पात्रा सूं
म्हे तो बो पात्र देखणा चावां
जको–
श्रम सूं नी थाकै
माटी मुळक बंधावै
हरियल पाना-पाना पर
मोती-सो पळका मारै
भरै उडारां
गिगन मंडल में
नूवी गैल रचावै।