आखर चार आवै

जमानो वींरा गीत गावै।

बखत पड़ै तो

माचिस री काड़ी सूं वींरी बीड़ी सिलगावै

‘गरज़ गधै नै बाप कुहावै।’

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : रोशनलाल कटारिया ,
  • संपादक : कन्हैयालाल शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : जून, अंक 04
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