कीं तिणकला

कर्‌‌‌या भेळा म्हैं

बणायो रूंख री डाळी

म्हैं म्हारो घर।

बगत बायरै सूं

लागी जोर री थाप

म्हारो रोवणो-हंसणो

गावणो का देवणो

दुरासीस बगत नै

अकारथ है।

भळै करूं भेळो

अेक-अेक तिणकलो

मांडू दूसर घर

बैठ देखूं नित आभै नै

पण नीं दीसै

आवतो बगत

अर उण रो बायरो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रतनसिंह ‘रत्नेश’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
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