अेक

भाखर री टी (शिखर) माथै ऊभो
अेकलो पेड़ हूं, म्हैं
कदैई आपरी किस्मत माथै इतरावतो
सब सूं ऊंचो होवणै रो घमण्ड हो
पण अब रोवूं हूं, किस्मत नै
निपट अेकलो, निरर्थक
किणी रै काम नहीं आवूं
भाखर री टी रो पेड़ हूं
निपट अेकलो।


दो

सड़क रै कनलो पेड़ हूं
ऊभो तो अेकलो हूं, पण
हूं कोनी अेकलो
आवतड़ा, जावतड़ा बटाऊ
बैठै छाया में
करै हथायां अर देवै है आशिष
कदैई ऊंट मारै मूंडो
तो कदैई बकरी नै मिलै लूंख
ऊभो हूं, अेकलो, पण
हूं, कोनी अेकलो।


तीन

पेड़ हूं, म्हैं अेक बड़ै बंगलै रो
हर महीनै काटीजूं अर छांटीजूं
क्यूं कै मालिक नीं चावै कै,
म्हैं बढूं उण सूं ज्यादा
खुद रो हाथ पूगै उणसूं डीगो
नहीं व्हैवण देवै
डीगो होवण सूं दूजों नै ई छाया
देवण लाग जावूं तो मंजूर कोनी
म्हारा मालिक नै।
खुद री दसा माथै रोवूं कै हंसूं।
समझ नीं आवै
पेड़ हूं म्हैं अेक बड़ै बंगले रो।

चार

रोही रो पेड़ हूं
घणो खुस और फळियो-फूलियो
पंखेरू घालै आळा
अर गावै गीत म्हारै माथै
भैंस्यां आवै अर खाज मिटावै
आपरै डील री
पण लारलै दिन मीट पड़गी
मिनख री
उण दिन सूं कांपू हूं
अर अरज करू हूं भगवान सूं
कै मिनख नै आगो राखजै
म्हैं रोही रो पेड़ हूं।
स्रोत
  • पोथी : जागती जोत ,
  • सिरजक : अर्जुनदान चारण ,
  • संपादक : भगवतीलाल व्यास
जुड़्योड़ा विसै