दुख-दरदां री लाय!

थूं तपा, घणी तपा

कस्टां रा कांटीला तावड़ा!

थूं थारा घणा आकरा रंग दिखावै

जद

जिंदगाणी रै बिरछ ऊपर

अणमवां रै डाळां ऊपर

खिलैला अणगिणत फूल—

गुच्छा-रा-गुच्छा!

तपा नै कित्तीक तपावैला थूं लाय!

तड़पा नै कित्तौक तड़पावैला मनड़ै रौ दरद!

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : बी. आर. प्रजापति ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : अगस्त 1987
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