यो गण गण तंत्र मनावे रै
मुक्त गगन आजाद पखेरू
पण दुख पावै रै।
गण-मण, गण-मण गाती दादी
हाथां काती पहरै खादी
समदर सी काँचाँ को चश्मो
नीठ मराड़ा की आजादी
तीन रंग खादी को लहर्यो कहतो जावै रै
बै तो लड़तां-लड़तां मरग्या
करग्या आपणै लेखै आछी
आपणै घर का घर मैं लड़र्या
न देर्या मरबा में पाछी
एक ओदड़ी जलम्यां भी, तलवार्या बावै रे।
महंगी चीजां बढ़तो भाड़ो
बना चीथड़ा कटतो जाड़ो
अफसर साही करै चींघण्यां
बजा रही शोषण को नंगाड़ो
हो नसीब खालै, न्है तो भूखा सो जावै रै
जण जण तो आजाद हो गयो
पण वा मुक्त नहीं हो पाई
आज बजारां बिचै जाती
डरी डरी हरणी की नांई
घणी स्वाघण्यां सासरियो, जिन्दी बळ जावै रै।
अंगरेजी बल्ली नै छोड़ी
देशी उंदरा लूंम गया
कुतर-कुतर कर ग्या खोखळी
च्यारूं खूणै घूम गया
खा-खा कर वै मोटा होग्या, करसो दुख पावै रै