सूंप्यो थांनै राज अबै थे कांईं चावो,

बण जनता रा ताज अबै थे कांईं चावो।

म्हे तो मिनखा जूण भुगतता रै ज्या स्यां,

थां नै सुख रा साज अबै थे कांईं चावो।

न्याव धरम री बात बतावो थे म्हांनै।

मच्छ गळा-गळ न्याव, अबै कांईं चावो।

दिवलै तळै अंधेरो होवै होवण दो,

थां रै घरै दियाळी अबै थे कांईं चावो।

मिनखां तणै मानखो जावै सोचो तो,

साची पूछो बात अबै थे कांईं चावो।

जनता नै दुख-दरद मिळै मत रिबकावो,

थां नै सुख रा सरग, अबै थे कांईं चावो।

आठ करोड़ कंठां री वाणी रजथांणी,

दे दीन्यो बलिदान, अबै थे कांईं चावो।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शिवराज छंगाणी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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