अेकै चलै जीमतो, इक्कीसो परवार।
उण घर जननी जनक अब, हुया कटीला भार॥
चूलै चाकी जद हुयो, घर-घर बहुवड़ राज।
गळी-गळी होवण लगा, लोग हसावण काज॥
मात-पिता खूणै पड़या, सुत पोढै रंग मोल।
जाणै गत परवार सै, कोई न बोलै बोल॥
सास करै अर काज सब, नोकरड़ी बहू जाय।
घर आयां अेवड़ कहै, मां दो चाय बणाय॥
सुत सूरज तो तप रयो, बहुवड़ लूवो बोल।
आंधी सरसा पोतरा, जावै आडा खोल॥
पाथण मां मोटो कियो, हळंया कर दिन रात।
बहू आतो वो दीकरो, बोलै बात कुबात॥
सुत हथलेवो जोड़तां, दीवी मात बिसार।
पगै लागतो ससुर रै, समझ्यो पिता न सार॥
बोदी बाड़ो सा हुया, मात पिता घर बार।
का रूखवाले खेतड़ा, का रूखाळै द्वार॥
बरसै बादळ दीकरो, बीजळ झळ बहू जोर।
आंगण भीगै मावड़ी, ऊभी रातों भोर॥