निजरां निहाल व्हैगी दीदार देखतां

दरसण नुवां-सा दीसै हर बार देखतां।

जद-जद चितारबा नै, आंख्यां उठावणी

दूणीं बहार दीसै, सोभा सुहावणी

करदी अंवार कतरी, सोची सांभळी

उण पार अटकगी, किंण आळोच में अळी?

ठिठकी ठगीजगी सी, इण पार पेखतां।

नीलाभ आसमानां, जद-जद बिथा जगाई

बेबस निगाह बहकी, ओठी ही लौट आई

लोयण दुखाय लीना, जो-जो दिसा-दिसा नैं

नींदां खराब कीनी, निरखी निसा-निसा नैं

बधती थकी बिथा रो, बिसतार-देखतां।

सपना घणा संजोया, मिलणै मिलावणै रा

संगती नित संवार्‌यां गीत मैं गावणै रा

सोचां सिरावणी की, सौ-सौ संताप सूं

मन क्यूं निरास हूग्यो, आपणै ही आप सूं?

बरबाद हूंण वाळ, आसार देखतां।

आखर समझ अणाई, अणजाण भावना

पैलां संचेड़ा पाछा पाया जे पावना

साजण समा रिया हा सांस’र उसास में

छाई ही आप री छिब, आस-पास में

सौ बर निसार व्हैगी, संसार देखतां।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बद्रीदान गाडण ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन, पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-19
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