अेक

बीनणी तू काम भोत मठ्ठो करै,
बात कांई है?
मां’सा, म्हूं जे काम ही करती,
तो घर आळा थारै घरै क्यूं भेजता!

दो

बीनणी तू बेगी-बेगी काम कर
आपां नै पिक्चर जावणो है।
मां’सा, थे क्यूं फिकर करो,
आपां घर आळा नै पिक्चर अठै ही दिखा देस्यां
पीसा लगावणै री कांईं जरूरत है।

तीन

बीनणी, आज तेरै पी’रै आळा आया है,
तनै लेवण आया हा कांईं?
नी मां’सा, थे फिकर ना करो,
बै भी अठै ही रैवण आया है।

च्यार

बीनणी, बावळी, तू तो हरदम मूंडो उघाड़ो राखै,
आ बात आछी कोनी,
मां’सा, म्हूं तो पी’रै में गोडा उघाड़ा राखती,
अठै तो मूंडो ही उघाड़्यो है।

पांच

म्हूं चालूं तो धरती हालण लाग ज्यावै
म्हूं मुळकूं तो चांदणी हार मान ज्यावै।
घूंघट उलटूं तो हाथी पछाड़ खा ज्यावै,
म्हारलो धणी सामै नाचण लाग ज्यावै,
पण रीस आवै तो म्हूं अेड़ी हूं
के घर रा सगळा बरतण फोड़ द्‌यूं
और तो कांई बताऊं, जी करै
म्हारली सासू री नाड़ मरोड़ द्‌यूं।
स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : करणीदान बारहठ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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