मायड़ भाषा नै भूल, पिछम री बोली बोलै,
रीत भांत सगळी भूल्यो, औ मिनख भटकतो डोलै!
करी मिनख पणै री धूड़, मिनख नै मिनख सतावै,
बूढै दादै-दादी री सेवा, करता जीव घणौ दुःख पावै!
भाई रा टाबर भूख स्यूं बिलखै, आप चूरमौ चूर'र खावै
मां बापू नै बात बात पर, बेटो आंख दिखावै।
कोजी चालै चाल, कपट रो काळो धंधो खोलै।
रीत भांत सगळी भूल्यौ, ओ मिनख भटकतो डोलै॥
छाछ राबड़ी, दही'र रोटी भौरां भौर जिम्यां करता,
खेतां मांही स्यूं खौद, भारियौ, सिर माथै ल्याया करता।
पढ़बारी बैळ्यां, पढ़बा जाता, चौखा नम्बर ल्याया करता,
खैलां मांही हा आगीवाण, मंचा माथै गाया करता।
अब नुवां चालग्या खेल, पूर मंच पर खोलै॥
दादोजी री पाग आज खूंटी पर टंगगी,
हुयो सिगरेटां रौ चलण, चीलम हाथां स्यूं छुटगी।
नहीं रही अब पणघट अर पणिहार्यां सगळी घर में बड़गी,
गायां बिन अब गावां में, गोधूळी टेम बिसरगी,
हारां में बूझगी आग, खीचड़ी पकणै स्यूं रैगी।
गिणती रा राखै पूर, लूगड़ी, सिर स्यूं ढळगी।
गयो आदरजोग नै भूल नशै में हर कीं बोलै॥
रीत भांत सगळी भूल्यो, ओ मिनख भटकतो डोलै
चाकी उपर धूंई, मोकळा माणस भैळा होंवता,
करता चौखी बात, भलेरी आड्या फळता।
किरत्यां ढळती रात लुगाइयां चाकी झोंती,
परदेश गयोड़ै साजन री यादां में दिवलो जोती
परवानो साजन रौ आवै, पोळ्यां स्यूं काग उड़ाती
दोघड़ ल्यांती भार, हेत रा गीत गांती—
‘राजू’ भूल्या सब गीत पोळ, बूझ्योड़ो दिवलो खोलै
रीत भांत सगळी भूल्यो, ओ मिनख भटकतो डोलै॥