कै, भाया! देखले तू देस रो के हाळ होर्‌यो है

अठै नित कागदां में

गांव की काया पलट'री है

मगर है योजना जितणी

हवा में ईं लटक’री है

मिलै अनुदान सरकारी

जिको सरपंच खा लेवै

प्रमुख, परधान जी हिस्सो

घरां बैठ्या मंगा लेवै

सुणा हां बैंक स्यूं करजो

घणो सरकार द्‌या’री है

व्हा मजदूर किसानां नै

घणी राहत पुंचारी है

बैयां तो बैंक वाळा भी

धुल्योड़ा दूध स्यूं कोनी

मगर डी. आर. डी. ए. स्यूं

सळटणो भोत भारी है

चवन्नी स्यूं अठन्नी तक, कमीसन अेक रिपियै पर

यूं चाकी चाल’री है अर कबीरो देख रोर्‌यो है

कै, भाया! देखले तू देस रो के हाल होर्‌यो है

कै, जाणै राम कैयां

गुड़ैगी देस री गाडी

कै, लेग्यो चोर कोई काल

थाणादार की पाडी

बैयां तो भोत बढिया है

सुरछ्या देस री ठाडी

जमानो ईं बुरो आग्यो

कोई अब के करै लाडी!

यूं चोरां रै घरां चौरी

अजब बात लागै है

कोई सड़यंत्र है भारी

गज़ब घात लागै है

नहीं तो पुलिस वाळा स्यूं

कुचरणी खेल थोड़ी है

मनै तो ईं में भी कोई

विदेसी हाथ लागै है

रात्यूं चोर गळियां में, फिरै खुल्ला अठै सगळै

सिपाईजी मजै में यार खूंटी ताण सोर्‌यो है

कै, भाया! देखले तू देस रो के हाल होर्‌यो है।

बियां तो होस्टल रै मांय

पहरो संतरी को हो

मगर पकड़्यो गयो बो भी

तो छोरो मंत्री को हो

कळी कचनार री कुचली गई

अर भ्रूण-हत्या में

सुणा हां दोस सगळो

देस रै धनवंतरी को हो

रात्यूं-रात, दब’गी बात

हवा में मिल हवा बै’गी

नहीं अखबार कुछ बोल्या

गरीबी सिसकती रै’गी

सुणै फरियाद कुण? सैयाद

जद कानून खुद बणज्या

कोई मरणो थोडो है जा’र

आंरै सामनै तण ज्या

ईं ताणी बोल मत ज्यादा, तू चुपचाप बैठ्यो रै

समय रो फेर है धीरज बता क्यूं यार खोर्‌यो है

कै, भाया! देखले तू देस रो के हाल होर्‌यो है।

अै, तस्कर है लूटेरा है

सकल संसार जाणै है

अै जो करतब करै है

देस री सरकार जाणै है

मगर है पूंच आंरी

भोत ठाडी काम है बांको

अजी, सरकार नै सरकाणियां

है नाम है आंको

जितणी पारट्यां है देस में

अै चलावै है

चुनावां मांय धन जी खोल की

अै लगावै है

नहीं तो पारट्यां पीसो

बता, पावै कठै स्यूं है

चुनावां मांय धन इतणो

बता, आवै कठै स्यूं है

अै जो चावै’र, जद चावै, पड़ै सरकार नै करणो

करै के? बापड़ी कै जीव नै जंजाळ होर्‌यो है

कै, भाया! देखले तू देस रो के हाल होर्‌यो है।

है जितणी भी अकादमियां

अठै, लूली’र खोड़ी है

राजनीति कला, साहित्य

तक में भी घुस्योड़ी है

कुपातर मान पार्‌या है

घणो सम्मान पार्‌या है

सुपातर नै मिलै सम्मान

कोई पोल थोड़ी है

अठै बिखर्‌या पड़्या है तार

निज-निज रै कडूंम्बा का

होया तरबूज स्यूं महंगा

अठै अब भाव तूम्बा का

अठै यस सर! कैवणियां री

फकत अब दाळ गळणी है

कोई तिकड़म भिड़ाया

चवन्नी यार चलणी है

ईं ताणी छोड़ दे सब कुछ’र तिकड़म बाज बण भाया!

कलम रो बण धणी खाली कलम नै क्यूं निचोर्‌यो है

कै, भाया! देखले तू देस रो के हाल होर्‌यो है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : ताऊ शेखावाटी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-14
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