हाकौ थमगौ है।

म्हैं रंगमंच माथै आयगौ हूं।

बारणै रै चोखटै माथै झुक’र

म्हैं आधी दूर सूं आवती आवाज में

सुणण री कोसीस करूं हूं

के जीवण में कांई-कांई बीतैला!

हजारूं ऑपेरा-झरणा सूं रात रौ

सरबग्रासी अंधारौ म्हारै ऊपर जम रैयौ है।

दादोसा, बापू, जे व्हेय सकै तौ

प्यालौ म्हारै सांम्ही सूं हटाय लौ।

थांरौ कठोर नाटक म्हनै रुचै है

अर म्हैं सांग करतौ राजी हूं।

पण दूजौ नाटक सरू व्हैय रैयौ है

इणमें म्हनै म्हारी इंछा सूं करण दौ।

द्रस्यां रौ क्रम तै होय चुकौ है

अर मारग रौ अंत तैसुदा है।

म्हैं अेकलौ हूं, सरबस डूबतौ जाय रैयौ है।

जिंदगाणी में चालणौ, मैदान में चालणौ नीं है।

स्रोत
  • पोथी : अपरंच अक्टूबर-दिंसबर 2015 ,
  • सिरजक : बोरिस पास्तरनाक ,
  • संपादक : पारस अरोड़ा ,
  • प्रकाशक : अपरंच प्रकासण
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