इण दुनियां रा चितरामा में, घणां विकारां वाळो हेत।

चेत सकै तो चेत चितेरा, चिता चढ़ण सूं पैली चेत॥

जिनगाणी रै परदै रच-पच, करम-कूंचड़ी फेरै थूं।

भर चटकीला काम-रंग में, ममता-मोह उकैरे थूं॥

ज्यूं-ज्यूं रंग फबै परदा पै, माया में रम खेलै है।

तीन करज रो फरज निभाता, लाखां पापड़ बेलै है॥

कांधे करतळ-जूड़ो झेल्यां मिनख जूण रो जोतै खेत।

चेत सकै तो चेत चितेरा, चिता चढ़ण सूं पैली चेत॥

खबर कतरा रूप धर्‌या थैं, जनम-मरण रा नाटक में।

मिनख-रूप पा पाछौ उळझ्यो, खट-करमां रा त्राटक में॥

जनम-डसोटण साल गिरह अर, तिलक सगाई चरचा में।

ब्याव मायरो कथा जातरा, परसादी रा खरचा में॥

रिश्तां रो नित राग अलापै, गरब-गीत रा साज समेत।

चेत सकै तो चेत चितेरा, चिता चढ़ण सूं पैली चेत॥

कठपुतली ज्यूं लोभ-डोर बंध, जगत-मंच पै नाचै थूं।

विगत जनम रा पुण्य पाप री, विगत हमेशा बांचै थूं।

करम-रकम री जोड़ जांच थूं नित श्री पोते लायां कर।

नकल-बही में जमां पुण्य री, रोकड़ रोज खतायां कर॥

देह-घड़ी सूं हर पळ कम है रोज सांस री रिस-रिस रेत।

चेत सकै तो चेत चितेरा, चिता चढ़ण सूं पैली चेत॥

जतरा थैं चितराम उकेर्‌या, देखण में ही लूंठा है।

इंद्र-धनुष ज्यूं सब सतरंगी, म्रिगतृष्णा ज्यूं झूठा है॥

भ्रम-मरूथल, जग, पंचवटी-तन, सब है मन-म्रिग छळबा नै।

थाक्यों जिण में दौड़ सुबह सूं, आयौ सूरज ढळबा नै॥

समझ! सफेदी, तन झुर्री अर झुकी कमरा रा झट संकेत।

चेत सकै तो चेत चितेरा, चिता चढ़ण सूं पैली चेत॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : शिव 'मृदुल' ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
जुड़्योड़ा विसै