ब्याह

एक दिन,

म्हारो भी होसी,

थारो भी होसी—मौत सूँ।

जद चाल पड़स्यां अठै सूं

छोड़'र कोई कठै

म्हे थानै।

रह जासी यादां

जरिये किणी किणी रे।

कोई रोसी,

कोई छाती कूटसी,

कोई खुशियाँ मनासी,

म्हारी

थारी

मौत पे।

रोणो-पीटणो

क्षणिक है।

क्यूँकै

फेर सारा

चुप करा दिया जासी

द्वारा किणी किणी रे

कहके

कै जाण आळो तो

चलो गयो

बस इतो सो

मातम होसी

म्हारी

थारी

मौत पर।

देखके भी थे

क्यूँ किण रै वास्ते,

इतो धन,

इकट्ठो करण

लाग रह्या हो।

अर लेण लाग रह्या हो दहेज

फैला रह्या हो भ्रष्टाचार,

कर रह्या हो मानवता रो उल्लंघण

बात जाणो हो कै ब्याह होसी

म्हारो भी

थारो भी

एक दिन—मौत सूँ।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : विष्णुकुमार शर्मा ‘भोलापंछी’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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