इक मावस री रात, बूठण आई बरसात,

च्यारूं कूंट धरतीपर बरस्यो पाणी सारी रात।

बूठण आई री बरसात–बूठण आई री बरसात।

काळायण है ऊमटी, बादळियां जस कोर,

म्हारो प्रियतम घर नहीं, होल्यां-होल्यां घोर

सेजां सोवण नहीं सुहात–बूठण आई री बरसात।

सुवरण री रेख्या लग्यै, बीजळ बादळ मांह

गळ सिहरां बीजळ लगै, म्हारै गळ कोई नांह।

सूख्यो म्हारो कोमल गात–बूठण आई री बरसात।

बरसा, काल विधूस कर, जीवण करसी चैन,

सूनो आंगण नांहि पिय, किम सूं बोल्या बैन।

बोलण म्हारै मनां भात–बूठण आई री बरसात।

बरसा बरसी मेड़ती, आंख्यां बरस्यो नीर,

बरसा सूं भीजी धरा, नीर भिजावण चीर।

चीर म्हारा भीज्या कदै सुखात–बूठण आई री बरसात।

घण अंधियारा री सखी, किम कर देखूं मग्ग।

बीजळ लेय झबूकड़ा, रैण बिताऊं जग्ग।

रैण पण काटै हू कटात–बूठण आई बरसात।

पिया भंमता जिण गया, उण रो मणवो आज,

काळी कंठळी, बरसरी गह-गह घोरहि गाज,

म्हारो हिवड़ो घणो डरात–बूठण आई री बरसात।

स्रोत
  • पोथी : जलम भोम ,
  • सिरजक : गोपाल शकून ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा प्रचार प्रकाशन, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : 2-3, जून-दिसम्बर
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