ढक लीया सै झरोखा

सजड़ दरूजो पोळी को

चेपली अचपळी जीभ

ताळूवै कै।

मींचली मांयली बै आंख्यां

जिकी पिछाणती

फरक, मान-अपमान को

फेरूं भी कुण जाणै

कुणसी चीरां सै आकर

तपती रेत सा सूंटा

झरबेज कर दियो

काळजो चालणी सो

काना की अेरण पर

सबदां रा घण

बरसता ई जावै है

अै गेलै क्यूं नहीं लागै

क्यूं बूढ़ी खोड़ नै सतावै है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : भगवतीप्रसाद चौधरी ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 13
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