भूख!

भूख तौ हरेक भूंड़ी व्है

पण

पेट री भूख

सै सूं भूंडी।

इणरी जड़ा

इती ऊडी कै

जनम सूं ले’र

मरण तांई

आदमी करतौ रेवै

इणरौ जाबतौ,

पण भूख रौ रूंख तौ

नित हरौ

अर नित ही साबतौ।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत मई 1983 ,
  • सिरजक : विक्रमसिंघ गुन्दोज ,
  • संपादक : नरपतसिंह सोढ़ा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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