बधती आबादी

सुकड़ती सड़कां। सुकड़ता मारग

जग में अे चाळा

दिनो दिन बधता जावै

इण सारू

अे लाम्बा चवड़ा राजमारग भी

सुकड़ता-घटता जावै

भौम री चावना

खोटी घणीं हुवै

घर रै आगै नित नूई चौकी

चौकी आगै कमरो

कमरै आगै चौकी

बणती जावै

चावना बणावै

छेकड़ बा चौकी

चौकी दर चौकी एक दिन

लूंठा भवन बण जावै

चौकी पछै और आगै बणै

और आगै बणै!

भौम चावना

एक दिन रचै महाभारत

जिण में सगळा लडै

भाई-भाई नीं बचै।

स्रोत
  • पोथी : सातवों थार सप्तक ,
  • सिरजक : इन्द्रा व्यास ,
  • संपादक : ओम पुरोहित 'कागद' ,
  • प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
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