सोनचिड़ी मन

डाळ-डाळ बैठै

धरती पर चुगै

आकासां रो ओर-छोर नापै

आतोड़ां-जातोड़ां नै

सुगन देवै

अर

साथी बिछट्यां झुर-झुर रोवै।

बुद्धि-राजा

नया-नया गढ़ बणा’र

नया-नया गढ़ जीतै

नया सपना सिरजै;

सुख री तिसना

बाड़ै री घास ज्यूं

हुलर-हुलर बधै

अर

सुख रा सरजाम बणावणियो (बो)

खांडै री धार पोढ़ै।

डागळै सी जिंदगी

तावड़ै दाझती रैवै

मोत-बिलाड़ी

मोको ताकती रैवै।

स्रोत
  • पोथी : मरूवाणी ,
  • सिरजक : रावत सारस्वत ,
  • संपादक : रावत सारस्वत ,
  • प्रकाशक : राजस्थान भासा प्रचार सभा, जयपुर ,
  • संस्करण : 08, अगस्त
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