मन री अंधियारी कोटरी में अचाणचक
कोई भोर रो सूरज आय हवळै सूं म्हानै उठावै
सगळो कळमस भगाय नूंवी जोत जगावै
मैं उण सोवणै, मन मोवणै
सांचोड़ै उजाळै नै देख उण माथै
बेसास नीकर हियै माथै री रजाई
खैंच’र सबरखी ओढ़ू, सोचूं!
औ तो सपनो है, साची बात नहीं।
ओढियोड़ी रजाई रै अंधियारै में
आंख्यां नै हिरदो घणो समझावै
जगावै चेतावै ‘भला आदमी
रजाई रै बारणै अेकर तो देख
धरती रै पोर-पोर सोनलियै सूरज
लिखियो है लेख’ पण हिवड़ै री बात
कुण सुणै कुण गुणै?