बापड़ी कविता
चौमासै, स्याळे, उन्याळै
बिना माइत रै
टाबर ज्यूं फिरै है।
उरबाणै पगां कादै में
कचपच होयोड़ी फिरै है
अर मेह में भीज्योड़ी
छ्याळी ज्यूं फिरै है।
बापड़ी कविता
फाट्योडै पूरां कै
कारी लगावै है
अर सींया मरती
अेक खूंणै में पड़ी-पड़ी
दांत कटकटावै है
वीखै री मारी
ई ठठार में पड़ी-पड़ी
आपरै करमड़ै नै रोवै है।
बापड़ी कविता
मझ दोफारी
भोभै टीबां में फिरै है
ताती लूवां री थापां खाय-खाय'र
आपरै तनड़े नै झुरै है
अर बिना घणी धोरी रै
डांगर ज्यूं फिरै है।