आंतां रा घेर सूं बंध्यो

गांव सूं स्हैर आयो बाप

अणचाहो मेहमाण

अपणां री आंख्यां रिड़कै।

हाथ री लाठी

देसी पहनावो

उठणूं-बैठणूं सै

बेटा-बहू नै अखरै।

कुड़ता री बगली

कौडी भर झलकती आंख’क

मोटी-मोटी आंख्यां

कुढ़ती बहू री।

वां रै मन तुफान

रूळ जासी ईं तरां

बंगला री इज्जत

ऑफिस-कॉलोनी मूं।

बूढी आंख्यां निरखै-परखै

कै सै उत्तर-पातर

बरफ री तरां गळतो वजूद

अपणै घर में।

अल-सुबै बूढ़ो बाप

चल दियो मिजमान सो

लकुटि टेकतो

अपणै गाँव कानी।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : हरदान हर्ष ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : 2010
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