कांन सुणै नी सद् री बातां
पग ना सुगणी सीध चलै।
हिवड़ै नै भटकावै मनड़ौ
अन्तर सद् नै असद् छलै॥
सगळा सरवर, घर-घर छीलर
बुगला, हंस बण्या बोलै।
चारूं दिस रावण बण साधू
सीता हर निधड़क डोलै॥
बातां सुख संपत कर, दुखड़ा।
अणगिण सुगणा दे जावै।
देवण री कय सै चुणियोड़ा।
लूट सकल घर ले जावै॥
फळ खावै रूंखां नै दिस-दिस
डाळ पात लख मून घरै
कौरव राज देख पाण्डू बन
नैण -नैण नभ धरा झरै॥