रैत बिकै सोने रे मोळ

सोनो गळियां रूळ जावै

जगरी रीत अंणूती दीसी,

मीठोतज कड़वो खावै

पाप घापग्यो,सांच सूखग्यो,

रावण, कंस हुया हरिया

नेम धंध्यो भूखो डोळै

फरता चरता रै हरिया

बगला उजळ घौल्या दीसै

घणी माछल्यां गटकावै

अजब अळेखा ओधड़ज्यांनै,

घणी मैनका मटकावै॥

राम सरीखा सहज भावनै

सोने के रो मिगरछळै

कौरव कड़बा,पांडव फेरी

छाती माथै मूंग दळै

मीठा बोलो दुनी दोगळी

तिलरो ताड़ बणावै

तेराताळ नचावै नाचण,

अेक रा इकवीस गणावै।

स्रोत
  • पोथी : जागती जोत फरवरी 1981 ,
  • सिरजक : मोर पांख ,
  • संपादक : महावीर प्रसाद शर्मा ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर
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