अणत नींद री नींव मांय रमतो
म्हारो आगोतर रो जायो मनै हेरै है
ठंडी सीळी आंबै री छायां हेठै
सपन-बाग में मनै उडीकै है, म्हारी सरगवासी मां।
हूं अर आ रात, आ नींद ओ सपनो!
म्है न्यारा-न्यारा हुयोड़ा हां।
म्हारा आंसू..!
म्हारी पतहीणी जिंदगानी रा रूखाळा
मनै आखरां मांय आज तांई ऊभो राख्यो है
अबार अर ईं अणचेत घड़ी में
हूं म्हारै पसीनै री बूंद-बूद सूं
अेकोकार हुवणो चावूं हूं
म्हारै माथै फिरै है, म्हारी मां रो आसीरवाद
म्हारै तकियै हेठै कोई पताळ सबद गूंज रैयो है
अकाळ मौत मर्यां मिनख जानवरां रा
छींट बींट बिखर्या हाडां मांय
म्हारी जुगानजुग री भूख अर प्यास ताफड़ा तोड़ै है
म्हारी मां! थारी मौत अर जलम री घड़ी री
कथा-अन्तर व्यथा हूं नीं जाणूं!
हूं नीं पैचाणूं तूं किसीक है? तूं क्यूं उडीकै है मनै?
म्हारा आगोतर रा जाया! तूं मनै क्यूं हेरै है?
बैरण रात! तूं आज नीं ढळसी कांई?
सपनै रा सांप! थारै बिल मांय और कांई-कांई है?
म्हारो रगत, म्हारा आंसू, म्हारो पसीनो–
आ रात, आ नींद, औ सपनो
कद टूटसी, आ भरमावणा?