मैं

प्रताप कोनी बण सकूं!

म्हारी सामरथ री दरकार

फकत पीथळ नै है

मैं जाणूं म्हारी निबळाई

अर फैर

सै प्रताप थोड़ा ही बणै!

मैं

नांव रो ठाकर!

पण मामूली आदमी

दिल्ली दरबार में

पाग झुकायां ही पार पड़ै

म्हारी

खम्मा करण री आदत है!

मैं अकबर रो मनसबदार!

सिर आंख्यां धारूं

उण रो हर हुकम

समर्पण-जूणी जींवतो थको

पीथळ बण सकूं

प्रताप रा जस गाय सकूं

समर्पण

म्हारै जीवण रो तंत!

ओपती सार्थकता हुय सकै

उणियारा हुय सकै

पीथळ रै मारग रो

पण प्रताप रो बिल्कुल नीं

मनै ओळभो कांई सोच’र देवो!

पीथळ

आप री जागां ईमानदार!

प्रताप री ईमानदारी

उण जोगी है, क्यूं कै–

ईमानदारी आदमी दीठ हुवै

ईसकां री ताकड़ी

चरित रो भारो क्यूं तोलणो

मारगू

तपतै तावड़ियै रा!

जद छांव री आस डिगै

घास री रोटी सारू

सै कमाई अडाणै नाखै

तो मैं चेती री ओळ्यां लिख सकूं

प्रताप नै प्रताप राख सकू!

मनै

उडीक! उडीक! उडीक!

गादी माथै ना अकबर है

ना प्रताप हळ्दीघाटी

फेर पीथळ री कांई जरूरत?

अर मनै यूं लागै

म्हारो जीवण अकारथ है!

स्रोत
  • पोथी : जागती-जोत ,
  • सिरजक : पुरुषोत्तम छंगाणी ,
  • संपादक : माणक तिवारी ‘बंधु’ ,
  • प्रकाशक : राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादेमी, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : अप्रेल, अंक - 02
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