उण दिन

जद मैं इसी धारा मांय सांपड़ रैयो

जिणरी छांट सूं ईज थे

कांप ऊठो,

इस्या वा मांय बैय रैयो

जिणरै ऊंडै उतरतां,

थे धूज जावो, डरपावो;

अर जळ क्रिड़ा करता

का सोन-तरी मांय तिरतां,

जद मैं इस्या दरद गाय रैयो

जिका थारै मांय नीं ऊठै,

इस्या सबदां मांय सुरां मांय

जिणरा अरथ-भेद, रस-भेद

थारै पल्लै कोनी पड़ै

जद थे नंदी रै कांठै

मेळो मांड दीन्यो,

बीण-बंधीज्योड़ै मिरगै री ज्यूं

मंतरीज्योड़ा ऊभा रैया,

देखता सुणतां

टाळ्यां को टळ्यां नीं।

अर आज

जद मै थारै बास मांय आयो हूं,

थारली गळ्यां मांय घूम रैयो हूं

थारला रगड़ा-टंटा नै गावूं,

थारली ईं बोली मांय

लै’र लैहजै मांय

जद थे म्हां सूं

कतरायनै निकळ जावो

अर म्हारली बात

म्हारै गळै मांय

गूंज’र गम जावै

थे घरू जिस्या नीं,

अजनबी-सा खींचीजो;

घर कानी नीं

अजबघर कानी डोभा फाड़’र देखो;

क्यूं’कै थे खुद अजब हो

अजनबी हो

अपणै सूं अपणै नै

देख नीं सको

देखता घबराइजो

का फेर लाजां मरो।

स्रोत
  • पोथी : ओळमों ,
  • सिरजक : हरिवंश राय बच्चन ,
  • संपादक : किशोर कल्पनाकांत ,
  • प्रकाशक : कल्पना लोक प्रकाशन रतनगढ़ (राज.) ,
  • संस्करण : अक्टूबर
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