राज गया

रजवाड़ा गया

गयी राजवी रीत!

पण, अजे

म्हारै अठै

बागां में घूमणियां

बना घणा!

बागां में आय’र

फूल तोड़णियां

महक लेवणणियां

भंवर घणा

दाखां-दाड़्यूं तोड़

अरोगणियां घणा!

कांईं फरमायो आप?

फुलवाड़ी लगावणियां,

सींचणियां?

सोधूं हूं

स्यात, कोई निगे जावै?

स्रोत
  • पोथी : हिवड़ै रो उजास ,
  • सिरजक : गिरधारी सिंह राजावत ,
  • संपादक : श्रीलाल नथमल जोशी ,
  • प्रकाशक : शिक्षा विभाग राजस्थान के लिए उषा पब्लिशिंग हाउस, जोधपुर
जुड़्योड़ा विसै