चौराहै रै
बीचोबीच
म्हैं अेक मूरती
चुपचाप अठैईज
कद री ऊभी हूं।
पोंच धातुओं सूं
बणियोड़ी
बिनों लोभ-लालच
कई साल हुग्या
दुनिया देखूं हूं।
कीड़ी नगरै जैड़ी
पैदल भीड़भाड़
कार, स्कूटर, बसों रो
धूंओ अर सौर सूं
बीमार हूगी हूं।
अठी चमचमावता
ऊंचा होटल बंगला
नीचै भूखा नागा
फुटपाथ माथै
अभियागत।
आवै नै जावै
मंहगाई री मार सूं
दबियोड़ा मिनख,
भ्रस्टाचार कर
फूलियोड़ा अफसर
कदैई हड़ताळी जूलूस
फिल्मों रा भोंपू,
बैंड बाजा नै छिकी
दायजै खातिर बळियोड़ी
लिछमी री अर्थी।
पोंच साल मोंय
प्रजातंत्र रा चूनाव
झूठा-साचा वादा
बोट मांगता नेता
ठगीजती जनता।
धरम रा पाखंड
हिन्दु मुसलमानों नै लड़ा
लोई बैवा, लोंपो लगा
घर दुकानों वाळै, पछै
कोमी अेकता रा नारा?
पढ़ी लिखियोड़ी
नुवींपीढ़ी बेरोजगार
भटकतो जीवण
आशाओं री हुवै
रोजीना दुर्घनाओं,
दिन उगै
अखाबारों टीवी मोंय
विकास री महिमा,
पण आंतकियों हाथों
मरता मिनख।
अव्यवस्था माथै
म्हारी मुट्ठीयों भींचिजै
नुवीं क्रांति खातर
अलख जगाऊं, पण
म्हैं मजबूर मूरती हूं।