हिवड़ै उठी पीड़
चीख ई चीख
बस्ती ईं बरस फेर
आतंक रो दरद
सहती रही।
सै’र री सड़कां
बिरहण सी
गांव री चौपाल
बोझ सरणाटा रो
ढोती रही।
हिमाळा होग्या
पीड़ रा पहाड़
काळी गैरी राती छांह
फटी आंख्यां
प्रीतझारां नै तरसती रही।
तिड़क्या पुश्तैनी बांध
पीड़ रो उत्कर्ष
बगत री बांझ गळियां
भेद री दीवारां
बढ़ती रही।
निरीह कपोत
दुबक्या पड़्या नीड़ां
धरोहर लाखीणी
अरदास शांति बरस री
करती रही।