आपणी संस्कृति

मन मोवणी, घणी निराळी

सबसूं सुरंगी

फूळां छाई डाळी

आपणी संस्कृति

जीवण री धारा में

आत्मा रो हेलो है

सभ्यता रा शरीर में

आस्था-विस्वास रो मेळो है

आपणी संस्कृति

सभ्यता रा पुसब में

फूटती सौरम है

भगत-भगती रे पाण

मथारै बैठ्यो ब्रह्म है

आपणी संस्कृति

सभ्यता रा उगाड़ा डील पै

पेरयोड़ा रूपाळा गाभा है

ज्यूं दीवा रै लार

उजासती जोत री आभा है।

आपणी संस्कृति

सभ्यता रा रूंख रै लाग्योड़ो

संस्कृति रो फळ है

मिनख रा शरीर में

मिनखपणां रो बल है

आपणी संस्कृति में लोग

तीरथ-जातरा करै

कुम्भ रा मेळा में

न्हावण नै जावै

सभ्यता-शरीर में विराजमान

आत्मा नै

पवित्रता रा पगला चढ़ावै

आपणी संस्कृति में

मन रै आंगणै

अबकी बार

मारीच सोना रो मिरग बण’र

छळ करैला

तो नक्की समझो

राम रै हाथ परो मरैला।

आपणी संस्कृति

दूध में धुल्यो माखन है

ज्यूं मन री दीवार पै

टंग्या कलेण्डर में

विराजमान कृष्ण है।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : रमेश ‘मयंक’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-27
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