आंख खोली जद सूं

सोना कै पालणै में झूलण मिल्यो

कोई भी चीज एक मांगी दस मिली

जिन्दगी भर जो चायो बो ही हाजिर

सारै दिन नौकर-चाकरां की हाजरी

चारुंमेर ठाठ ही ठाठ

अक्ल अर समझदारी कठै सूं आती

ज्यां-ज्यां उमर बढी

बाळणजोगो सुभाव बिगड़तो गयो

अब तो इंसान नै इंसान

समझणै की ल्याकत भी

आई-गयी होगी।

जे बचपण में कड़ी मेहनत करी होती

इंसान नै इंसान समझ्यो होतो

पीसां की कहाणी जाणी होती

तो आज कूट-कूट कर समझदारी आती।

पैंड-पैंड पर अकल मुसकाती

हाथा में हूनर होतो

अर हर चीज में उस्तादी होती।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : बनवारीलाल अग्रवाल ‘स्नेही’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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