हरफां मांय सूं सोनो निकाळ’र

कुण रचिया है अै सोनलिया ग्रंथ

काळ जिणां रै सामी डंडौत करै

जिकां रा भंवारा चढ़तै धूजतौ फिरै?

काळ, जिको चील झपट्टा देय’र बोच ले

मिनख लुगाया नै, जिया-जूण नै।

गासिया कर ले

सभ्यता रै अैनाण रा।

समूचो गिट जावै

मिनख रो बणायौ सगळो अड़खंचौ

कला रै नांव माथै कसियोड़ो सिकंजौ

भख लेंवतो जेज कोनी करै काळ

विकराळ, महाकाळ!

पण पाडां सूं भचीड़ा खाय’र

बादळां री भांत फीस जावै

ओ, आखरां री अमोघ सगति रै सामीं

काळजयी आखर काळ नै कांई धारै

काळ तो खुद आखरां री आरती उतारै।

अर आखर

जे रीझ जावै तो

इमरत री झाटी सूं छिड़को देय’र

अखी कर दे उण काळ नै

अणत काळ तांई।

सोनलियै ढाळै में लिखीजै बो काळ

आखरां रै परताप सूं।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : सुमन बिस्सा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-28
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